हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद




बहुत समय पहले, इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में एक छोटे से बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम था ध्यान सिंह। पिता सेना में थे और उन्हें हॉकी खेलना बहुत पसंद था। छोटे ध्यान को भी यह खेल अच्छा लगने लगा।

लेकिन ध्यान को शुरू में ज्यादा खेल का मौका नहीं मिलता था। वे दिन में सेना का काम करते और रात को चाँदनी में अभ्यास करते। इसी वजह से उनके साथी उन्हें प्यार से “चंद” कहने लगे। धीरे-धीरे यही नाम “ध्यानचंद” बन गया।

ध्यानचंद का खेल जादू जैसा था। जब वे हॉकी स्टिक से गेंद को दौड़ाते, तो ऐसा लगता मानो गेंद उनसे चिपक गई हो। 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में उन्होंने भारत को स्वर्ण पदक दिलाए। जर्मनी के तानाशाह हिटलर भी उनके खेल से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें जर्मन सेना में नौकरी का प्रस्ताव दिया। लेकिन ध्यानचंद ने मना कर दिया और कहा –
“मैं केवल अपने भारत के लिए खेलूंगा।”

ध्यानचंद बहुत बड़े खिलाड़ी बने, पर कभी घमंड नहीं किया। वे हमेशा सरल और सच्चे इंसान बने रहे।

बच्चों के लिए सीख

1. ध्यानचंद ने मेहनत और अभ्यास से ही जादूगर का नाम पाया। इससे हमें सीख मिलती है कि मेहनत ही सफलता की कुंजी है।


2. वे कभी हार नहीं मानते थे, चाहे सामने कितनी भी कठिन टीम क्यों न हो। बच्चों को भी हिम्मत से पढ़ाई और जीवन की चुनौतियों का सामना करना चाहिए।


3. उन्होंने हमेशा टीम के लिए खेला, अपने लिए नहीं। हमें भी दोस्तों और सहपाठियों के साथ मिलकर काम करना चाहिए।


4. उन्होंने साधारण जीवन जीकर दिखाया कि महानता सादगी में है।


5. सबसे बड़ी बात, उन्होंने देश के लिए खेला। बच्चों को भी देश और समाज के लिए कुछ अच्छा करने का सपना देखना चाहिए।


निष्कर्ष

मेजर ध्यानचंद की कहानी हमें बताती है कि अगर हम मेहनत, अनुशासन और समर्पण से काम करें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। वे सिर्फ हॉकी के जादूगर नहीं थे, बल्कि एक सच्चे आदर्श भी थे।

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